ॐ नमः शिवाय

संक्षिप्त परिचय :-

                                           तीर्थ श्री जटाशंकर धाम मध्य प्रदेश राज्य के छतरपुर जिला की तहशील बिजावर से दक्षिण दिशा में १५ किलोमीटर दूर स्थित हैं। जहां भगवान शिव जी ( भोलेनाथ ) जटाओं के स्वरुप में विराजमान हैं। श्री जटाशंकर धाम दो विंधपर्वतो के मध्य गुफा में स्थित हैं। यह प्राचीन मंदिर भगवान शिव की , जटाओं के रूप में मूर्ति होने के फलस्वरूप यह स्थान श्री जटाशंकर धाम के नाम से दूर-दूर तक प्रसिद्ध व विख्यात हैं। प्राकृतिक सौन्दर्यता से परिपूर्ण यह स्थल जहां घनघोर वन , वन्य -प्राणियों का स्वच्छंद विचरण, मोर - मयूर का नृत्य, झरनों का निरंतर जल प्रबाह, पर्यटक यात्रियों का सहज ही मन मोह लेता है।

                                           श्री जटाशंकर धाम बुंदेलखंड का केदारनाथ है। जहाँ पर सदैव हरे - भरे वृक्ष जो हवा के झोंको से झूम - झूम जाते हैं, उनहे देख कर ऐसा प्रतीत होता हैं कि मानो ये वृक्ष शिव महिमा का गुणगान कर रहे हैं। सदा जलबहार नामक जलस्रोत से गिरने वाली जल धारा , हर - हर की धव्नि के वातावरण का निर्माण करती हैं ,ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ की प्राक़तिक रमणीयता भगवान के समीपस्थ डेरा डाले हुए है। धार्मिक आस्थाओ एवं मान्यताओं के लिए यह स्थल परम पवित्र एवं प्रसिद्ध है। जहां हजारो की संख्याओं में पीतल घंटो की आवाजे गूँजती रहती हैं यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ -साथ दार्शनिकता का भी केंद्र है।

संतवाणी :-

                                           साधु - संतों द्वारा स्थान श्री जटाशंकर धाम के इतिहास के सन्दर्भ में प्रकाश डालते हुए कहा जाता है कि माता पार्वती जी द्वारा आदि देव शिव जी को पुनः वर के रूप में प्राप्त करने हेतु विन्ध्य श्रेणियों में तप किया गया था। यह तीर्थ स्थल ही पार्वती माता की तपोस्थली हैं। जो वर्तमान में श्री जटाशंकर धाम के नाम से विख्यात व जानी जाती हैं। कुछ साधु संतो के मतानुसार इस घनघोर वन में एक जटासुर नामक दैत्य रहता था। जिसके इष्ट के रूप में श्री शिव भगवान विराजमान थे । वह इसी स्थल पर तप, पूजा, अर्चना करता था। जिसे पांडवो ने अपने वनवास के दौरान उसका वध किया एवं भीमकुण्ड होते हुए वनवास करते रहे,इसके प्रमाण में चट्टानों पर पद चिन्ह अंकित हैं। भीमकुण्ड का अथाह जल स्त्रोत पांडव पुत्र भीम के नाम से विख्यात है।

लोककथाएँ :-

श्री जटाशंकर के समीपस्थ ग्रामीणो द्वारा सदैव कथाये कही जाती हैं। कहा जाता है कि श्री जटाशंकर धाम की खोज १६५०-१७०० ईसवी में हुई है, जब दिल्ली के मुग़ल शासक द्वारा हिन्दुओं के मंदिर - मुर्तिया तोड़ी जाती थी। जब खजुराहो के मंदिरो की तोड़ फोड़ कर मुग़ल शासक की फौज - पलटन जागेश्वर मंदिर की ओर चली , तभी बीच में विश्राम के लिए सेना का पड़ाव डाला गया । सम्पूर्ण सेना व अश्वबल के लिए पीने का पानी पर्याप्त न होने से चिंता बड़ी जिसमें शासक द्वारा पानी की तलाश करवाई गयी। काफी कठिनाई के उपरांत एक सैनिक को मदुमक्खी के भिन - भिनाहट में पानी का स्त्रोत दिखाई दिया। उस सैनिक सूबेदार ने अपनी प्यास बुझाई व पेयजल भरवाकर सेना की पेयजल पूर्ति कराई और सूबेदार सेनापति जो चर्म रोग सफेद दाग से पीड़ित था, पूरा चेहरा ,हाथ सफेद दाग से ग्रसित थे ,पानी के स्पर्श से तुरंत ही ठीक हो गये। यह देखकर बादशाह को आश्चर्य हुआ। एक दिन बादशाह को रात्रि में स्वप्न आता हैं कि तुम्हारी फौज -पलटन सैनिक - अश्वबल पेयजल के अभाव में व्याकुल हैं। तुम इस जंगल में ८४ तालाब व ५२ वावरी का निर्माण करवाओ तभी तुम्हे शांति का अनुभव होगा। बादशाह में स्वप्न को साकार कराया। समीपस्थ तालाब व वावरी के अवशेष इस कहानी को प्रमाणित करते हैं। जहाँ शासक का पड़ाव था ,उस क्षेत्र को आज भी बादशाह का चबूतरा कहा जाता हैं साथ ही जिन मजदूरो- कारीगरों ने तालाबों का निर्माण किया था, वे जहा रहते थे दिल्ली वाले के नाम से आज वर्तमान में उस स्थान को डिलारी गावं के नाम से जाना जाता हैं जो जटाशंकर क्षेत्र में सम्मिलित हैं।

सहयोगी मंदिर :-

श्री ठाकुर जी मंदिर , श्री पार्वती मंदिर ,श्री हनुमान जी मंदिर प्राचीन मंदिरो के साथ ऊपर श्री जुगल किशोर मंदिर व श्री रामजानकी मंदिर और निर्मित हो चुके है।